Wednesday, February 4, 2009

आधुनिकता बनाम पौराणिकता

धुनिक समाज में हम अपने आप से अक्सर यह सवाल पूछते है, हम हमारी संस्कृति से दूर क्यों होते जा रहे है। क्या यह बदलाव की निशानी है। क्या आने वालें दिनों में हम अपनी संस्कृति को पुरी तरह से भूल जायेंगे। ये सवाल अनुत्तरित रहा जाता है। हमारा देश, जो अपनी संस्कृति से विश्व भर में जाना जाता है, उसका क्या । अब सवाल ये भी उठता है की हम कौन सा पक्ष ले । हम उस दोराहे पर खड़े है जहाँ से एक रास्ता हमें साक्षात्कार करवाता है, एक विहंगम दृश्य से जिसके आलोक में हम अपने विशाल अतीत के उन सुनहरे पलों को जीने के लिए उत्साहित हो सकते है। एक अन्य रास्ता हमें एक नवीन समाज को गढ़ने को प्रोत्साहित करता है । इस समाज में नवगतो के लिए न तो कोई बंधन है और न ही रिश्तों की बुनियाद मजबूत है । इस कठिन समय में जब मानव मूल्यों का ह्रास हो रहा है, ऐसे में निर्णय की घड़ी कठिन हो गयी है।

Sunday, February 1, 2009


भारत में प्रोयोजित आंतकवाद की जितनी भर्त्सना की जाए उतनी कम है.

Sunday, January 25, 2009

फूलों का गुलदस्ता

भारतीय संस्कृति की एक अलग पहचान है, उसमे से एक है, हमारा परिवार और उसकी वैभवता और विविधता, जिसके सानिध्य में परिवार के लोग सद्भाव और प्रेम का भरपूर प्रदर्शन करते है। यह मेल और अपनापन हमे शायद ही कही देखने को मिलें। चाहे परिवार संयुक्त हो या फिर एकल हो, उसके संस्कार और विचार हमे वह शक्ति देता है, जिसके बल पर हम अपने और परिवार के सभी सदस्यों के लिए अपनी समस्त उर्जा वहां करने में जुट जाते है। यही है भारतीय परिवारों का एक गुलदस्ता, जो हमारे लिए नयी स्फूर्ति और उत्साह का कारण बनते है, और हमे प्रेरणा देते है।